जय मर्जर
जय विलय
आते थे जो साईकिल पर
अब चलते हैं इम्पाला में
अधिकारी तो वहीं पिस रहा
शाखा की श्रमशाला में
करते थे जो हमको अभिनन्दन
रुकते नहीं हैं विनती पर
जिनका इनसे भला हो रहा
हैं वो अधिकारी गिनती पर
बैठ हमारे सीने पर ये
तन के हिस्से बाँट रहे
बोई हैं जो हमने फसलें
उनको निर्मम काट रहे
पेंशन पर ठोकर मरवाई
इनके ठेकेदारों ने
अब वेतन पर दाग लगाया
इनके भ्रष्ट करारों ने
समय और भी विकट बनेगा
लघु बैंकों पर होगा दम
वेतन, भत्ते, अन्य फायदे
होते अब जायेंगे कम
एस बी आई की छाया में भी
क्यों फिरते हो बन निर्धन
झटपट विलय करा कर ले लो
ग्रेच्युटी, पी ऍफ़ और पेंशन


परशुराम की प्रतीक्षा से कुछ उद्धरण:
घातक है, जो देवता-सदृश दिखता है,
लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है,
जिस पापी को गुण नहीं; गोत्र प्यारा है,
समझो, उसने ही हमें यहाँ मारा है।
चोरों के हैं जो हितू, ठगों के बल हैं,
जिनके प्रताप से पलते पाप सकल हैं,
जो छल-प्रपंच, सब को प्रश्रय देते हैं,
या चाटुकार जन से सेवा लेते हैं;
यह पाप उन्हीं का हमको मार गया है,
भारत अपने घर में ही हार गया है।
ओ बदनसीब अन्धो ! कमजोर अभागो ?
अब भी तो खोलो नयन, नींद से जागो।
वह अघी, बाहुबल का जो अपलापी है,
जिसकी ज्वाला बुझ गयी, वही पापी है।
कह दो प्रपंचकारी, कपटी, जाली से,
आलसी, अकर्मठ, काहिल, हड़ताली से,
सी लें जबान, चुपचाप काम पर जायें,
हम यहाँ रक्त, वे घर में स्वेद बहायें।
हम दें उस को विजय, हमें तुम बल दो,
दो शस्त्र और अपना संकल्प अटल दो।
हों खड़े लोग कटिबद्ध वहाँ यदि घर में,
है कौन हमें जीते जो यहाँ समर में ?
हो जहाँ कहीं भी अनय, उसे रोको रे !
जो करें पाप शशि-सूर्य, उन्हें टोको रे !